उधार दिया पैसा वापस लेने के लिए पहले ब्याज समेत सही रकम निकालिए, सबूत जुटाइए, उधार लेने वाले से दस्तख़त वाली पावती लीजिए और लिखकर माँगिए। फिर भी न मिले तो सिविल केस कीजिए, और चेक बाउंस हुआ हो तो चेक का केस। उदाहरण: मार्च 2024 में ₹1 सैकड़ा पर ₹80,000, ₹10,000 लौटे, 1 नवंबर 2026 को ₹95,386.67 बकाया।
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उधार दिया पैसा वापस कैसे लें: एक-एक कदम
- कितना बकाया है, निकालिए: मूल, तय दर पर ब्याज, और बीच में लौटाया पैसा।
- सबूत जुटाइए: बैंक या UPI रिकॉर्ड, कोई पर्ची या चेक, मैसेज, गवाह।
- दस्तख़त वाली पावती लीजिए कि पैसा बकाया है। इससे समय-सीमा भी नए सिरे से शुरू होती है।
- लिखकर माँगिए: रकम और चुकाने की तारीख़ के साथ, या वकील से नोटिस भिजवाइए।
- सिविल केस कीजिए: प्रोनोट या लिखित एग्रीमेंट हो तो समरी सूट, वरना आम केस।
- चेक बाउंस हुआ हो तो धारा 138 की सख़्त समय-सीमाएँ मानिए।
- हर कदम पर कानून के दायरे में रहिए: न धमकी, न बदनामी, न कोई सामान उठाना।
समय का ध्यान शुरू से रखिए। उधार दिए पैसे का केस आम तौर पर उधार की तारीख़ से 3 साल के अंदर करना होता है। देखिए उधार वसूली की समय-सीमा।
कदम 1: ठीक-ठीक कितना बकाया है, निकालिए
सबसे पहले सही रकम निकालिए, क्योंकि आगे हर कदम पर यही लिखी जाएगी। मान लीजिए आपने 10 मार्च 2024 को UPI से ₹80,000 दिए, ₹1 सैकड़ा पर (साधारण ब्याज, साल का 12%), लौटाने की कोई तारीख़ तय नहीं थी। 1 फ़रवरी 2026 को उधार लेने वाले ने ₹10,000 लौटाए और उधार मानते हुए एक पर्ची पर दस्तख़त किए। लौटाया पैसा पहले बकाया ब्याज में जाता है, इसलिए पूरा ब्याज में गया और मूल ₹80,000 ही रहा।
| रकम | |
|---|---|
| ब्याज, 10 मार्च 2024 से 1 फ़रवरी 2026 (22 महीने 22 दिन) | ₹18,186.67 |
| 1 फ़रवरी 2026 को जमा, पूरा ब्याज में | − ₹10,000 |
| उस भुगतान के बाद बचा ब्याज | ₹8,186.67 |
| ब्याज, 1 फ़रवरी 2026 से 1 नवंबर 2026 (9 महीने) | ₹7,200 |
| मूल (वही) | ₹80,000 |
| 1 नवंबर 2026 को कुल बकाया | ₹95,386.67 |
तो 1 नवंबर 2026 को भेजी माँग में ₹95,386.67 लिखे जाएँगे, और उसके बाद हर महीने ₹800 ब्याज। लौटाया पैसा पहले ब्याज में क्यों जाता है, यह पार्ट पेमेंट: पहले ब्याज में समझाया है।
कैलकुलेटर में आज़माएँयही हिसाब पार्ट पेमेंट कैलकुलेटर में खोलिए और तारीख़ या रकम बदलकर देखिएकैलकुलेटर में आज़माएँ1 फ़रवरी 2026 तक का ₹18,186.67 ब्याज कैलकुलेटर में जाँचिएकदम 2: उधार के सबूत जुटाइए
- बैंक या UPI रिकॉर्ड, जिसमें पैसा उधार लेने वाले के खाते में गया दिखे। इससे पैसा जाना साबित होता है, वजह नहीं, इसलिए साथ में कुछ ऐसा रखिए जिससे दिखे कि यह उधार था।
- कुछ भी लिखा हुआ: प्रोनोट, लोन एग्रीमेंट, आपके खाते में दस्तख़त वाली एंट्री, बीच में लौटाए पैसे की रसीद।
- चेक, जो उधार लेने वाले ने दिया हो, भले अभी बैंक में न लगाया हो।
- मैसेज और ईमेल, जिनमें वह उधार की बात करे, समय माँगे या लौटाने का वादा करे। इन्हें डिलीट न करें; फ़ोन और बैकअप सँभालकर रखिए।
- गवाह, जिन्होंने पैसा देते देखा हो या उधार लेने वाले को मानते सुना हो।
चैट, ईमेल और स्क्रीनशॉट इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 कहता है कि सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक होने की वजह से इन्हें सबूत मानने से मना नहीं किया जा सकता (धारा 61)। इन्हें कोर्ट में रखने के लिए धारा 63 के तहत एक सर्टिफ़िकेट चाहिए, अधिनियम की अनुसूची वाले फ़ॉर्म में, जिसमें रिकॉर्ड और डिवाइस का ब्योरा हो और डिवाइस के ज़िम्मेदार व्यक्ति के दस्तख़त। यह आपका वकील तैयार करता है।
उधार प्रोनोट पर दिया था, तो देखिए प्रोनोट: ब्याज, वैधता और भरने का तरीका।
कदम 3: दस्तख़त वाली पावती लीजिए, और 3 साल की सीमा याद रखिए
उधार दिए पैसे के लिए लिमिटेशन एक्ट उधार देने की तारीख़ से 3 साल देता है, भले पैसा माँगने पर लौटाना तय हुआ हो (अनुसूची, अनुच्छेद 19 और 21)। उदाहरण में यह लगभग 10 मार्च 2027 तक है।
धारा 18 के मुताबिक़, अगर उधार लेने वाला यह समय पूरा होने से पहले लिखकर और दस्तख़त करके कर्ज़ मान ले, तो दस्तख़त के दिन से नई मियाद शुरू होती है। धारा 19 में बीच का भुगतान भी यही करता है, पर तभी जब भुगतान की बात उधार लेने वाले की अपनी लिखावट में हो या उसके दस्तख़त वाले काग़ज़ पर। 1 फ़रवरी 2026 की दस्तख़त वाली पर्ची से आख़िरी तारीख़ लगभग 1 फ़रवरी 2029 हो जाती है।
तारीख़ वाली छोटी सी पर्ची काफ़ी है: कितना उधार लिया, कब, कि अभी बकाया है, और उधार लेने वाले के दस्तख़त। ठीक आख़िरी दिन और क्या पावती मानी जाएगी, यह हालात पर निर्भर है, इसलिए समय रहते वकील से पूछिए। और तारीख़ें व उदाहरण 3 साल का नियम में हैं।
कदम 4: लिखकर माँगिए या लीगल नोटिस भेजिए
माँग की चिट्ठी में उधार, अब तक मिला पैसा, किसी तारीख़ तक ब्याज समेत बकाया रकम, और चुकाने की वाजिब तारीख़ लिखिए। बहुत लोग इसे वकील के ज़रिए लीगल नोटिस की तरह भेजते हैं। ऐसे तरीके से भेजिए जिससे पहुँचने का सबूत मिले, और कॉपी रखिए।
- ब्याज लिखकर माँगिए। कोई दर तय नहीं थी, तो ब्याज अधिनियम (Interest Act), 1978 की धारा 3 कोर्ट को उस तारीख़ से ब्याज देने देती है जो ऐसे लिखित नोटिस में हो जिसमें कहा गया हो कि ब्याज माँगा जाएगा।
- चेक बाउंस में 30 दिन के अंदर लिखित नोटिस केस की कानूनी शर्त है। नीचे चेक वाला हिस्सा देखिए।
- बात तथ्यों तक रखिए। रकम और तारीख़ें लिखिए। पुलिस, बदनामी या किसी ग़ैरकानूनी चीज़ की धमकी न दें।
कदम 5: सिविल केस, आम या समरी
पैसे की वसूली का केस (recovery suit) आम रास्ता है। कोर्ट कर्ज़ और ब्याज तय करता है, फिर उसकी डिक्री लागू कराई जा सकती है।
- समरी सूट (CPC ऑर्डर XXXVII)। प्रोनोट, हुंडी और बिल ऑफ़ एक्सचेंज पर केस के लिए, और लिखित कॉन्ट्रैक्ट से बने तय कर्ज़ की वसूली के लिए, ब्याज के साथ या बिना। उधार लेने वाले को समन मिलने के 10 दिन के अंदर हाज़िर होना होता है, और कोर्ट की अनुमति (leave) के बिना वह बचाव ही नहीं कर सकता; यह अनुमति "समन फ़ॉर जजमेंट" मिलने के 10 दिन के अंदर माँगनी होती है। बचाव बेबुनियाद या परेशान करने वाला हो, तो अनुमति नहीं मिलती।
- आम केस। जब कोई लिखित कॉन्ट्रैक्ट या प्रोनोट न हो, और उधार बैंक रिकॉर्ड, मैसेज और गवाहों से साबित करना हो।
समझौता किसी भी समय हो सकता है। रकम और किस्तों की तारीख़ें लिखिए और दोनों पक्ष दस्तख़त करें।
चेक बाउंस हुआ हो: धारा 138 की समय-सीमाएँ
कर्ज़ चुकाने के लिए दिया चेक बिना भुगतान लौट आए, तो परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 138 में यह अपराध है, पर तभी जब हर समय-सीमा पूरी हो। कोर्ट मानकर चलता है कि चेक कर्ज़ चुकाने के लिए दिया गया था, जब तक चेक देने वाला उल्टा साबित न करे (धारा 139)।
| कदम | समय-सीमा |
|---|---|
| चेक बैंक में लगाइए | चेक की तारीख़ से 6 महीने में, या उसकी वैधता तक, जो पहले हो |
| चेक देने वाले को लिखित माँग भेजिए | बैंक से चेक लौटने की सूचना मिलने के 30 दिन में |
| चेक देने वाला भुगतान करे | आपका नोटिस मिलने के 15 दिन में |
| शिकायत (केस) दर्ज कीजिए | वे 15 दिन पूरे होने के बाद एक महीने में (धारा 142) |
- सज़ा: 2 साल तक जेल, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों।
- अंतरिम मुआवज़ा: केस चलते हुए कोर्ट चेक देने वाले से चेक की रकम का 20% तक दिलवा सकता है (धारा 143A)।
- समझौता (कंपाउंडिंग): यह अपराध समझौते से ख़त्म हो सकता है (धारा 147)। *Sanjabij Tari* (25 सितंबर 2025) में सुप्रीम कोर्ट ने ख़र्च तय किया: बचाव पक्ष की गवाही से पहले समझौता हो तो कुछ नहीं, उसके बाद पर फ़ैसले से पहले चेक की रकम का 5%, सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में 7.5%, और सुप्रीम कोर्ट में 10%।
- जल्दी समन: उसी फ़ैसले में ट्रायल कोर्ट से कहा गया कि समन ईमेल, मोबाइल या WhatsApp से भी भेजें, और आरोपी को शुरुआत में ही ऑनलाइन भुगतान का विकल्प दें।
कोर्ट कितना ब्याज दिला सकता है
- केस से पहले का: दर तय थी, तो उसी दर पर माँगिए, पर बहुत ज़्यादा दर को कोर्ट परख सकता है (देखिए भारत में कानूनी ब्याज दर)। दर तय नहीं थी, तो ब्याज अधिनियम, 1978 कोर्ट को "current rate of interest" तक ब्याज देने देता है, जिसे कानून बैंकों की जमा दरों से जोड़ता है, और ब्याज पर ब्याज नहीं।
- केस से डिक्री तक: कोर्ट जो दर वाजिब समझे (CPC धारा 34)।
- डिक्री के बाद: जो उधार कारोबारी नहीं है, उस पर ज़्यादा से ज़्यादा 6% सालाना (₹0.50 सैकड़ा)। व्यापार या कारोबार से जुड़े उधार पर यह ज़्यादा हो सकता है: तय दर तक, या दर तय न हो तो राष्ट्रीयकृत बैंकों की कारोबारी कर्ज़ की दर तक।
यानी ₹1 या ₹2 सैकड़ा की दर डिक्री के बाद शायद न चले: 6% सालाना सिर्फ़ ₹0.50 सैकड़ा है। आख़िर में कितना ब्याज मिलेगा, यह कोर्ट तय करता है।
पैसा वापस न करने पर कौन सी धारा लगती है?
आम तौर पर कोई नहीं: उधार न लौटाना मुख्य रूप से सिविल मामला है, जिसकी वसूली केस से होती है। तीन बातें:
- धोखाधड़ी के लिए शुरू से बेईमानी की नीयत चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ उधार न लौटा पाने से धोखाधड़ी का मुक़दमा नहीं बनता, जब तक लेन-देन की शुरुआत में ही बेईमानी की नीयत न दिखे (*Satishchandra Ratanlal Shah*, 2019)। धोखाधड़ी अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 में है, जिसने IPC की धारा 420 की जगह ली।
- चेक बाउंस NI Act की धारा 138 में अपराध है, जैसा ऊपर बताया।
- पुलिस शिकायत वसूली का तरीका नहीं है। शिकायत से पहले वकील से बात कीजिए, क्योंकि अपराध से मेल न खाने वाली शिकायत नाकाम हो सकती है और आपका सिविल केस भी लटका सकती है।
क्या न करें: परेशान करना अपराध है
- उधार लेने वाले या उसके परिवार को धमकी न दें। किसी से कुछ करवाने के लिए उसके शरीर, इज़्ज़त या संपत्ति को नुक़सान की धमकी देना आपराधिक धमकी (criminal intimidation) हो सकता है (भारतीय न्याय संहिता की धारा 351)।
- कोर्ट के आदेश के बिना उसका फ़ोन, गाड़ी, सोना या कुछ भी न उठाएँ, और ज़ोर-ज़बरदस्ती न करें।
- उसे सबके सामने, सोशल मीडिया पर या परिवार के ग्रुप में बदनाम न करें, और उसके दफ़्तर में बार-बार फ़ोन न करें।
- कुछ राज्यों में ज़बरदस्ती वसूली के ख़िलाफ़ अलग कानून भी हैं। वसूली सिर्फ़ ऊपर बताए तरीकों से कीजिए।
स्रोत
- लिमिटेशन एक्ट, 1963, अनुसूची: अनुच्छेद 19 और 21 (उधार दिया पैसा)
- लिमिटेशन एक्ट, 1963, धारा 18 (लिखित स्वीकृति)
- लिमिटेशन एक्ट, 1963, धारा 19 (आंशिक भुगतान)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023, धारा 61 और 63 (इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड)
- ब्याज अधिनियम (Interest Act), 1978, धारा 3
- सूदखोरी ऋण अधिनियम (Usurious Loans Act), 1918, धारा 3, Dayawati बनाम Inderjit (सुप्रीम कोर्ट, 1966) में
- सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908, धारा 34 (ब्याज)
- CPC ऑर्डर XXXVII नियम 1(2), Mahou India बनाम Aradhna Wines (हिमाचल हाई कोर्ट, 2019) में उद्धृत
- IDBI Trusteeship Services बनाम Hubtown (सुप्रीम कोर्ट, 2016): ऑर्डर XXXVII नियम 3, बचाव की अनुमति
- परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act), 1881, धारा 138, 139, 142 और 147
- Noor Mohammed बनाम Khurram Pasha (सुप्रीम कोर्ट, 2022): धारा 143A का पाठ
- Sanjabij Tari बनाम Kishore S. Borcar, 2025 INSC 1158 (सुप्रीम कोर्ट, 25 सितंबर 2025)
- Satishchandra Ratanlal Shah बनाम गुजरात राज्य (सुप्रीम कोर्ट, 3 जनवरी 2019)
- Adarsh Parasramka बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (कलकत्ता हाई कोर्ट, 12 अगस्त 2026): BNS धारा 318 में धोखाधड़ी
- आयकर अधिनियम, 2025, धारा 185 (₹20,000 या ज़्यादा का उधार नकद नहीं)
7 छोटे जवाबउधार का पैसा वापस लेना: आपके सवाल
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दोस्त उधार के पैसे वापस न करे तो क्या करें?
ब्याज समेत सही रकम निकालिए, सबूत जुटाइए, दस्तख़त वाली पावती लीजिए, फिर लिखकर माँगिए। न मिले तो सिविल केस कीजिए, और चेक बाउंस हुआ हो तो चेक का केस। केस उधार की तारीख़ से, या बाद की दस्तख़त वाली पावती से, 3 साल के अंदर कीजिए। धमकी कभी न दें।
बिना लिखा-पढ़ी के दिया उधार वापस कैसे लें?
अक्सर लिया जा सकता है, अगर उधार साबित हो। बैंक या UPI ट्रांसफ़र, ऐसे मैसेज जिनमें वह उधार माने, बीच में लौटाया पैसा और गवाह, सब मदद करते हैं। लिखित कॉन्ट्रैक्ट या प्रोनोट न हो, तो समरी सूट नहीं, आम केस होता है। अभी उससे एक छोटी पावती पर दस्तख़त करा लें, तो काम बहुत आसान हो जाता है।
क्या WhatsApp चैट या UPI पेमेंट उधार का सबूत है?
ये सबूत बन सकते हैं। UPI रिकॉर्ड बताता है कि पैसा उधार लेने वाले को गया; चैट, जिसमें वह उधार माने या लौटाने का वादा करे, बताती है कि क्यों। इलेक्ट्रॉनिक होने से इन्हें ठुकराया नहीं जा सकता, पर कोर्ट में रखने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 का सर्टिफ़िकेट चाहिए।
पैसा वापस न करने पर कौन सी धारा लगती है?
आम तौर पर कोई आपराधिक धारा नहीं: उधार न लौटाना मुख्य रूप से सिविल मामला है। धोखाधड़ी (BNS धारा 318, पहले IPC 420) के लिए लेन-देन की शुरुआत से बेईमानी की नीयत चाहिए, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा। चेक बाउंस NI Act की धारा 138 में आता है। पुलिस के पास जाने से पहले वकील से पूछिए।
क्या ₹20,000 से ज़्यादा नकद उधार पर चेक बाउंस केस हो सकता है?
हाँ। Sanjabij Tari (25 सितंबर 2025) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनकम टैक्स कानून तोड़कर ₹20,000 से ज़्यादा का नकद उधार लेने से कर्ज़ धारा 138 के केस के लिए बेकार नहीं हो जाता। टैक्स का नियम फिर भी लागू है, इसलिए जहाँ हो सके, उधार बैंक से दीजिए।
क्या केस से पहले लीगल नोटिस भेजना ज़रूरी है?
चेक बाउंस में हाँ: बैंक की सूचना के 30 दिन के अंदर लिखित माँग केस की शर्त है। सिविल केस में लिखित माँग आम पहला कदम है, और अगर ब्याज की दर तय नहीं थी, तो "ब्याज माँगा जाएगा" लिखा नोटिस कोर्ट को उस तारीख़ से ब्याज देने देता है।
उधार के पैसे पर कोर्ट से कितना ब्याज मिलता है?
तय दर हो तो वही, पर बहुत ज़्यादा दर को कोर्ट परख सकता है। दर तय न हो, तो कोर्ट लिखित नोटिस की तारीख़ से ब्याज दे सकता है। डिक्री के बाद, ग़ैर-कारोबारी उधार पर ब्याज ज़्यादा से ज़्यादा 6% सालाना है, यानी ₹0.50 सैकड़ा।